पशु भी मनुष्य की तरह प्राणी है। बुद्धि की दृष्टि से कुछ पिछड़े हुए हैं तो क्या, शारीरिक सुख दुख तो उन्हें भी समझदार कहलाने वाले मानव प्राणी की तरह होता है। बुद्धिमान होने के कारण मनुष्य सब प्राणियों का ज्येष्ठ भ्राता है। इसलिए उसका नैतिक कर्तव्य है अपने इन छोटे भाइयों के सुख-दुख का भी अपने सुख-दुख की तरह ध्यान रखें। मानव अंतःकरण में भगवान ने दया और करुणा जैसी विभूतियां इसीलिए दी है कि दूसरों को कष्ट न पहुंचाकर उनकी सुविधा बढ़ाने में सहायता करें। पशु भी आखिर जीवधारी हैं ही हैं और हर जलधारी में एक ही परमात्मा होने के कारण सबके साथ अपनापन जुड़ा रहना चाहिए, उनके सुख-दुख की अनुभूति अपने भीतर भी उसी रूप में करनी चाहिए। ऐसा होने पर यह कहा जा सकता है कि हमने मनुष्यता जीवित हैं।
दुख की बात है कि हम आत्मीयता की अनुभूति से रहित निष्ठुर पाषाण जैसे बनते चले जा रहे हैं और निरीह पशु-पक्षियों के साथ ऐसी क्रूरता बरतते हैं मानो उन्हें कुछ कष्ट ही न होता हो। जीभ के स्वाद के कारण नाम पर, पौष्टिक आहार के नाम पर मांस खाने की जो परिपाटी चली और बढ़ी है, उसने मनुष्य को खूनी भेड़िए की पक्ति में ला खड़ा किया है। मांस मनुष्य की बनावट और प्रकृति के सर्वथा विरुद्ध होने से उसे केवल शारीरिक और मानसिक हानि ही पहुंचा सकता है। फल, मेवा, दूध और शक्कर आदि को छोड़कर जो घृणित मृत रक्त, मांस में स्वाद ढूंढते हैं, उनकी कुरूचि को गए गुजरे स्तर की ही कहा जा सकता है। मांसाहारी जीवो की प्रवृत्ति क्रोध, छल आदि अनेक दुर्गुणों से भरी रहती है।मरते भी वे जल्दी ही है। दीर्धजीवि तो शाकाहारी हो सकते हैं। इतने पर भी मनुष्य की दुर्बुद्धि को क्या कहा जाए जिससे प्रेरित होकर वह निरीह प्राणियों को मर्मभेदी कष्ट देकर उनके प्राण हरता हरण करता और अपने पेट को कब्रिस्तान बनाता चला जाता है।
यह दुख तब और भी अधिक होता है जब यह जघन्य कृत्य ग्य देवी देवताओं को बदनाम करने और धर्म को उपहासास्पद बनाने के लिए पशुबलि के रूप में किया जाता है। आएदिन देवी-देवताओं को प्रसन्न करने के लिए उन्हें पशु-पक्षियों की बलि चढ़ाने के आयोजन होते रहते हैं। इससे विवेकवानों की दृष्टि में देवताओं को नृशंस-निष्ठुर होने तथा क्रूर असुरों की तरह निरीह निर्दोषों का प्राण हरण करने वाला ही सिद्ध किया जा सकता है। यदि देवता सचमुच ऐसे ही होते हैं तो अनुदान में भी हमें ऐसा ऐसी ही नृशंसता मिलेगी और हम मनुष्य को सामान्य स्तर के से नीचे गिर कर नर-पिशाचों की पत्तीं में आ खड़े होंगे। अच्छा होता मांसाहारी लोग ऐसे कुकृत्य में देवताओं को भागीदार बनाकर उन्हें बदनाम न करते।
अत्याधिक श्रम लेकर, समर्थ से अधिक वजन लादकर या दौड़ाकर उन्हें तिल-तिल कर मारना एक बरगी छुरी से मार डालने से कम कष्टकर नहीं। घायल पीठ पर ईट होते हुए गधे, अत्यधिक भारी बोझ की गाड़ी खींचते हुए बैल, अधिक सवारियों सहित तांगों में दौड़ते हुए घोड़े देखकर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है इनमें सामर्थ्य से अधिक काम लेकर किसी प्रकार सता-सताकर मारा जा रहा है। अपने स्वार्थ की वस्तुओं के लिए या किसी इच्छा को पूरा करने के लिए उनका वध कर अपनी इच्छा को पूरा करना। शिकार के नाम पर न जाने कितने प्राणियों को आएदिन अपने प्राण गवांकर हमारा आसुरी मनोरंजन करना पड़ता है। मनुष्य इस प्रकार असुरता की ओर बढ़ता चला गया तो इसका परिणाम बहुत ही अहितकर होगा, वह दिन दूर नहीं जब वह परस्पर ही फाड़ खाने के लिए भेड़ियों से आगे बढ़ जाएगा।
- Akhand knowledge
परम धर्म:-
गुप्तरोग के लिए योग(जन्नन अंग,गुदा समस्या),पाइल्स,कब्ज,गैस...में फायदेमंद साबितby Dr Rajan(n.d.d.y)
शुभकामना:- यजुर्वेद 40/2


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